सोमवार, 3 अक्टूबर 2022

ब्रहम देव स्थान चॉदपुर का सहस्त्रलिंग मंदिर, बराह का मंदिर व बेलमणी मंदिर

 देवभूमि देवगढ़ से दक्षिण पूर्व 11 किलोमीटर दूर स्थित चांदपुर कस्बे में सदियों पुराने मठ मंदिर आज भी अपने मूल स्वरूप में विद्यमान है. अनेको मंदिरो मे से एक सहस्त्रलिंग मंदिर अपनी भव्यता दिव्यता और स्थापत्य कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है. मुख्य मंदिर मंडप के समीप भग्नावस्था मे अनेक नागवंश कालीन नंदियों की मूर्तियां अवस्थित है. मंदिर के मंडप में विशालकाय नंदी शिव साधना रत है. सनातन धर्म को चरितार्थ करते एक ही जलहरि में कई शिवलिंग स्थापित हैं. शिवलिंग का आकार अपेक्षाकृत छोटा और गोलाकार है. ग्रेनाइट पत्थरों को एक दूसरे से पजल के रूप में जोड़कर इन मंदिरो का निर्माण किया गया है. मंदिर के प्रवेश द्वार पर भक्ति भाव से अलंकृत कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं अंकित है. मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू, अद्भुत, अलौकिक, अद्वितीय सहस्त्र लिंग हजारों वर्षों से आज भी अपने मूल रूप में विद्यमान है. भूतल से लगभग पॉच फीट ऊचॉ यह विषाल षिवलिंग चौकोर जलहरि मे अवस्थित है सहस्त्रलिंग कला की दृश्टि से दो भागो मे विभक्त है उपरी भाग मे अनेको देवी देवताओ को मूर्तित किया गया है लिंग के नीचे वाले भाग को चौकोर आकार देकर संभवः ब्रहमा विश्णु महेष तथा गणेष का अंकन किया गया है इस विषाल सहस्त्रलिंग को देखकर मन भक्तिभाव मे रम जाता है तथा हृदय से पवित्र मंत्रो मे उच्चारित उद्गार उत्पन्न होते है यही कि शिव शाश्वत है, शिव अनंत है, शिव सर्वव्यापी है, शिव अविनाशी है, शिव अखंड है, शिव सर्वज्ञ है.

 मंदिर परिसर में कई टूटे भग्न मंदिरों की श्रृंख्ला के साक्ष्य दिखाई पड़ते हैं. सहस्त्रलिंग मंदिर परिसर मे दाहिनी ओर प्राचीर विहीन एक अन्य मंदिर विषाल चौडे स्तंभो पर खडा है इस मंदिर के पिछले स्तंभ में अप्रतिम, मनभावन भगवान विश्णु तथा लक्ष्मी की मूर्तियां उकेरी गई है. अपेक्षाकृत कम चौड़ाई वाले इस मंदिर के प्रवेशद्वार पर दोनों ओर तथा ऊपर ध्यान मग्न विभिन्न देवी-देवताओं का अंकन किया गया है. इन मंदिरों की वैभवता अपने काल में चरम पर थी. बिखरे पड़े मंदिरों के अवशेष प्राचीन भारतीय सनातन परंपरा तथा स्थापत्य कला का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. 

कई प्रस्तरो को सलीके से काटकर जमाकर देवस्थान का निर्माण किया गया है. इन अनेकों मंदिरों में से एक मंदिर सृष्टि के पुनर्रचिता भगवान वराह का छत व प्राचीर विहीन मंदिर प्रमुखता से आकर्षित करता है. 33 कोटि देवी देवताओं को वराह की प्रतिमा में अंकित कर इसे दिव्य और भव्य स्वरूप प्रदान किया गया है. रखरखाव का अभाव और श्रद्धा भाव में कमी इन मूर्तियों की वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार है. विदेशी आक्रांताओ के विध्वंस चिन्ह खंडित मूर्तियों में देखे जा सकते हैं. शताब्दियों पूर्व निर्मित यह बराह प्रतिमा नश्वर है. प्राचीन भारतीय कलाकारों की निपुणता, कौशलता और विविधता इस बराह की मूर्ति मे देखी जा सकती है. 

मुख विहीन यह प्रतिमा सदियों से आसमां को ओढ़े यूं ही खड़ी है और सदियों तक यूं ही खड़ी रहेगी. यह अजर है यह अमर है. बराह मंदिर परिसर विशाल है. प्राचीन भारतीय शासकों द्वारा प्रचुर मात्रा में भगवान बराह की प्रतिमा को विंध्यांचल में स्थापित कराया गया था. यहां अनेकों मठों के बिखरे पड़े अवशेष स्वतह अपनी ओर आकर्षित करते हैं. मंदिर परिसर में ही शताब्दियों पूर्व उकेरा गया भारतीय सनातन संस्कृति का प्रतीक चिन्ह शिलालेख स्तंभ खड़ा है. शोधकर्ता मंदिर परिसर को घूमकर इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंच सकते हैं कि यह विध्वंश किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं बल्कि, किसी मूर्ति भंजक ने बड़ी निर्लज्जता से सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का असफल प्रयास किया हैं. शिव स्तुति करते पति पत्नी तथा रण मे जाते योद्धा के अंकन सैकड़ों की संख्या में यहा पडे मिलते हैं जिनमे काल तिथि और नामों का उल्लेख है. 

चांदपुर का बेलमढ़ी मंदिर अनोखा और विस्मयकारी है. धरातल से लगभग, 4 फीट ऊंचा मंदिर प्रस्तर 3 फीट ऊंचे परकोटे से युक्त है. लाल पत्थरों से निर्मित यह मंदिर आधार स्तंभों पर टिका है. छत भार संभालें यक्षो की मूर्तियां ध्यान मग्न है. आधार स्तंभों के ऊपर मेहराबों में की गई बारीक नक्काशी आश्चर्यचकित कर देती है. प्राचीन काल में चांदपुर, कई साम्राज्यो के लिए ब्रह्म देव स्थान रहा होगा. पग पग पर मंदिरों और मठों की बहुलता, यहां के लोगों की धार्मिकता अध्यात्मिकता तथा सामाजिकता के निरपेक्क्ष प्रमाण हैं. बेलमढी मंदिर के निकट ही एक अन्य मंदिर कला की अनुपम छटा बिखेरता हुआ वीराने मे खडा हुआ है मूर्ति विहिन इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर सुन्दर देव कुलिकाओं का निर्माण कर मनमोहक देव प्रतिमाओं को स्थापित किया गया है. मंदिर की पिछली बाहरी दीवार पर भगवान गणेश की चार भुजाधारी ध्यान मग्न मूर्ति अलंकृत है. मूर्ति की आभा अभूतपूर्व है और मन को शांत चित्त कर देती है. मंदिर की बाहरी दाहिनी दीवार की देवकुलिका में भगवान बराह का अंकन है. मूर्तियों की रमणीयता चरम पर है. इन्हें बनाने वाले कुशल कलाकार ना केवल वेद पुराण के ज्ञाता थे बल्कि उनकी बुद्धिमत्ता उस कालखंड में शीर्ष पर थी. ज्ञान की देवी मां वीणा वादिनी मां सरस्वती की प्रतिमा भी देवकुलिका में उपलब्ध है. 

इन सबके अतिरिक्त चांदपुर में जैन मंदिर भी प्रचुरता से मिलते हैं. इन हिंदू व जैन मूर्तियों का उत्कीर्णन देखकर ऐसा प्रतीक होता है इन मूर्तियों को बनाने वाले एक ही रहे होंगे. कुछ भी हो यह ब्रहम देवस्थान क्षेत्र सनातन संस्कृति के उन सभी तत्वों को अपने जैवमंडल में समाहित करता है जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता को महान बनाते हैं. यह क्षेत्र शताब्दियों से विश्व के कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है.

व्ही. के. मेहरा


ब्रहम देव स्थान चॉदपुर का सहस्त्रलिंग मंदिर, बराह का मंदिर व बेलमणी मंदिर

 देवभूमि देवगढ़ से दक्षिण पूर्व 11 किलोमीटर दूर स्थित चांदपुर कस्बे में सदियों पुराने मठ मंदिर आज भी अपने मूल स्वरूप में विद्यमान है. अनेको म...